वो आये थे नस्ल सुधारने...!

तीसरी फसलवो आये थे नस्ल सुधारने...!

NEWSMAN DESK

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किस्सा 1991 के दौर का है। स्थान है उड़ीसा का नवापाड़ा जिला। इसी जिले के एक गांव का गरीब दलित किसान मंगल सुनानी मन ही मन रोमांचित हो रहा था। सरकार उसे एक ऐसी चमत्कारी गाय देने जा रही थी, जिससे उसकी गरीबी काफी कम हो जायेगी। इस गाय को जर्सी सांड के वीर्य से गर्भवती किया जायेगा, जिसे पुणे तथा और जगहों से मंगाया गया है। फिर तो देखते ही देखते कुछ ही सालों में वह ढेर सारी दुधारी गायों और बैलों का मालिक बन जायेगा। 

कुछ समय बाद उलवा गांव का ये हरिजन सरकार की कृपा से और गदगद हो गया। सरकार ने मुफ्त में उसे एक एकड़ जमीन दे दी। इस जमीन पर उसे सुबाबुल के पेड़ लगाने थे, ताकि उस गाय के लिये चारे के लिये इंतजाम हो सके, जो उसे जल्दी ही मिलने वाली थी। उसके गांव में सरकार से इस तरह का लाभ पाने वाले 38 परिवार थे। कोमना ब्लाॅक के अन्य गांवों में ऐसे हजारों लोग थे। सरकार ने उन्हें दूध विकास की एक प्रमुख योजना के लिये चुना था, जिसका लक्ष्य था गरीबी को दूर करना। इन लोगों को जब पता चला कि मुफ्त मिली इस जमीन पर पेड़ लगाने के एवज में उन्हें सरकार द्वारा न्यूनतम मजदूरी भी दी जायेगी तो वो एकदम भाव विभोर हो गये। 

समन्विता नाम की यह परियोजना 1978 के आसपास शुरू हुई थी। 80 के दशक के शुरू के सालों में यह जोर पर थी। पश्चिम उड़ीसा कृषिजीवी संघ के जगदीश प्रधान बताते हैं कि, सभी लोग बड़े जोश के साथ इसमें जुटे थे। 

उन्होंने बताया इस परियोजना में पांच एजेंसियां शामिल थी। इनमें भारतीय एग्रो इंडस्ट्रीज फाउंडेशन भी था, जिसकी स्थापना प्रमुख उद्योग घराने मफतलाल ने की थी। इसके अलावा इसी घराने का एक एनजीओ सतगुरू सेवा ट्रस्ट भी इस कार्यक्रम में शामिल था। इसके अलावा भारतीय स्टेट बैंक भी अपनी भूमिका निभा रहा था। राज्य का पशुपालन विभाग और राजस्व विभागों ने भी अपनी जिम्मेदारी संभाली हुई थी। इस योजना के जुड़े हर व्यक्ति की तरह अधिकारी भी अपने उद्देश्य के प्रति समर्पित थे।

इनका मकसद एक नये और बेहतर नस्ल के मवेशी तैयार करना था। किसी भी हालत में अशुद्धता या मिलावट को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा, कम से कम ऐसा ही बताया और जताया गया। अब इस बात की गारंटी कैसे दी जाये कि लोगों को जो गायें दी गई है, उनका गर्भाधन जर्सी सांड के वीर्य से ही होगा?

इस सवाल ने योजना से जुड़े लोगों को बेचैन कर दिया। अगर इन गायों ने स्थानीय सांडों से संपर्क कर लिया तो भद्द पिट जायेगी। उन्हें इन लोकल सांडों से बचाना होगा। फिर क्या था! कोमना के हाईस्कूल के प्रधानाचार्य बिश्वंभर जोशी बताते हैं कि स्थानीय सांडों को बधिया बनाने का कार्यक्रम पुराने वाली परियोजना से पहले शुरू किया गया।

चुन-चुन कर उड़ीसा के इस ब्लाॅक के सांडों को बधिया बनाया गया। हर तरफ सांडों की चीख पुखार मची। इलाको के पशुधन निरीक्षकों ने बड़ी निर्ममता के साथ कोमना, खरियार और खरियार रोड के सभी सांडो का बधियाकरण किया। इस काम में दो करोड़ रूपये का बजट खर्च हुआ, लेकिन गनीमत ये रही कि सांड बख्शे नहीं गये। आखिर उद्देश्य पवित्र जो था।

इसके बाद जर्सी के शुक्राणु से गायों का कृत्रिम गर्भाधन किया गया। दो साल बाद समूचे इलाके में आठ बछड़े पैदा हुये। गांव वालों को एक लीटर भी फालतू दूध हासिल नहीं हुआ। इधर सुबाबुल के पेड़ों का भी कहीं नामो-निशान नहीं था, जबकि उन्हें हजारों की तादाद में लगाया गया था। 

दस साल बाद इसके नतीजे और भी चौंकाने वाले आये। कोमना के आसपास के गांवों में एक भी सांड नहीं बचा था। बधिया बनाने का जो अभियान चलाया गया था, उसमें कम से कम इस क्षेत्र में स्थानीय खरियार सांडों की पूरी नस्ल ही खत्म कर के रख दी गई, जबकि नई नस्ल से उतना दूध नहीं मिल रहा था, जितना पहले मिलता था।

उलवा में फदकू टांडी ने मुझे बताया कि अब इस गांव में एक भी सांड नहीं बचा है। टांडी भी इस परियोजना का कृपा पात्र था। वो बताता है कि आठ बछिया पैदा हुई। जो बहुत छोटी और बेकार थी। कुछ तो मर गई और कुछ को बेच दिया गया। वो सभी बिल्कुल भी दूध नहीं देती थी। इसी गांव के एक दूसरे लाभांवित श्यामल कुलदीप ने बताया कि मैंने और मेरी पत्नी ने किसी तरह छह बछड़ों को पाला। इनमें से चार तो एक ही दिन में मर गये। आखिर में कोई जिंदा नहीं बचा। 

गांव के प्रधान ने बताया कि पहले उनकी पांच गाय थी। उससे उन्हें एक दिन में 40 लीटर दूध होता था। अब इस कार्यक्रम के बाद 14 लीटर दूध हो रहा है। अब कहां अपना सिर फोड़े और किससे कहें! बाद में जांच आयोग बना तो पता चला कि न तो वो नस्ल यहां के मौसम के लायक थी और न ही वो पेड़ यहां लग सकते थे। करोड़ों रूपये का बजट समाप्त होने के बाद ब्लाॅक के हर गांव को सरकार की तरफ से नोटिस आया कि अपनी-अपनी जमीन वापस करो। फिर एक दिन सरकार ने सभी की जमीन वापस ले ली और तीन साल बाद सभी अधिकारी भुवनेश्वर लौट गये। तीन साल के बाद उन्होंने समन्वित कार्यक्रम को बंद करने का ऐलान किया। उन्होंने गांव वालों को बताया कि अब हम लोग जा रहे हैं और इस कार्यक्रम को किसी और जगह पर लागू करेंगे। 

आज इस पूरे इलाके से पलायान बढ़ा है। गांव में गरीबी है और बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। बाद में एक सिफारिश यह भी आयी कि सरकार अगर इन सभी गरीब परिवारों को एक-एक एकड़ जमीन दे दे और उन्हें उनकी मर्जी के मुताबिक फसल बोने दे, तो उनकी आर्थिक हालत ठीक हो सकती है। लेकिन इस योजना में कोई बजट खर्च नहीं हो रहा था, लिहाजा यह सिफारिश कभी नहीं मानी गयी। 

(यह हिस्सा मशहूर पत्रकार पी. साईनाथ की चर्चित किताब 'Every Body loves a good Drought' से लिया गया है। इस किताब को कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी चर्चा मिली। इस किताब में पी. साईनाथ भारत के सबसे निर्धन जनपदों का हाल बयान करते हुए देश के भीतर सरकारों की व्यवस्था और लूट का खाका बुनते चलते हैं। इस किताब में बताया गया है कि कैसे सरकारी योजनाये गांव में काम करती हैं और कैसे यहां असमानता दिखती है।)

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