गौरव नौड़ियाल ने लंबे समय तक कई नामी मीडिया हाउसेज के लिए काम किया है। खबरों की दुनिया में गोते लगाने के बाद फिलहाल गौरव फिल्में लिख रहे हैं। गौरव अखबार, रेडियो, टीवी और न्यूज वेबसाइट्स में काम करने का लंबा अनुभव रखते हैं।
नियंत्रण रेखा के आर-पार धुएं के गुबार और हिमालय की चोटियों पर गूंजते लड़ाकू विमानों की गर्जना के बीच बाजार का एक गुप्त और रणनीतिक खेल अपने चरम पर है. इस खेल का असल खिलाड़ी चीन बनकर उभर सकता है, जिसने एआई में पश्चिम को 'डीपसीक' के जरिए चुनौती देने के बाद असल में अपने रक्षा उद्योग का लोहा भी भारत-पाक जंग में पहले ही दिन मनवा लिया है. सीएनएन जैसे स्थापित मीडिया हाउस ने भारत के राफेल जेट गिरने की खबर पहले दिन ही ब्रेक कर दी थी. हालांकि, भारत की ओर से इसकी पुष्टि अब तक नहीं हुई है. इंटरनेशन मीडिया में इस खबर के आने के बाद, चीन के रक्षा उद्योग पर नए सिरे से मंथन शुरू हो गया है. भारत-पाकिस्तान संघर्ष की स्थिति में चीन को भारत के संसाधनों को भटकाने, पाकिस्तान पर पकड़ बढ़ाने, आर्थिक और रणनीतिक लाभ लेने और वैश्विक मंचों पर भारत को कमजोर करने जैसे कई संभावित लाभ हो सकते हैं.
पाकिस्तान की रक्षा क्षमता और साहस, दोनों ही काफी हद तक चीनी सैन्य सहयोग पर आधारित हैं. चीन के पास पाकिस्तान में बड़े रणनीतिक हित हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण है चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपैक) और बलूचिस्तान में अरब सागर तक पहुंच. इस क्षेत्र में भारत की कोई भी कार्रवाई सीधे सीपैक को खतरे में डालती है. पिछले दिनों पाकिस्तान की ओर से बलूचिस्तान में भारत समर्थित उग्रवाद का आरोप भी लगा.
इन तथ्यों की रोशनी में देखें तो पहलगाम हमले की आड़ में भारत और पाकिस्तान को एक बार फिर से युद्ध की दहलीज़ तक लाने वाला यह घटनाक्रम, सिर्फ आतंकवाद का मसला नहीं है, बल्कि इसके पीछे चीन की अपने बाजार को लेकर एक बहुस्तरीय रणनीति भी स्पष्ट उभरकर सामने आती है. ऐसे तथ्य भी अब सामने हैं, जिनमें चीन के मुनाफे कई गुना हैं. तथ्य जो बाजार के गलियारों से 7 मई को ही सामने आ गया और वो ये कि भारत-पाक युद्ध का सीधा फायदा चीनी रक्षा कंपनियों को मिल रहा है. ये युद्ध चीनी रक्षा कंपनियों के अब तक इस्तेमाल न हुए उत्पादों के बाजार में स्थापित होने के लिए भी मुफीद बन गया है. भारत-पाक युद्ध को चीनी तकनीक के रक्षा उद्योग में स्थापित होने के महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में भी दर्ज किया जा सकता है. बाजार ने 7 मई को चीनी रक्षा तकनीक यानी कि जे-10 सी से फ्रांसीसी और रूसी रक्षा तकनीक राफेल को ध्वस्त होते हुए देखा. इस तनाव ने चीनी मुख्यभूमि के निर्यातकों के लिए बेहतर संभावनाओं का संकेत दिया है.
पाकिस्तान, जिसने जे-10 सी लड़ाकू जेट सहित अपने अधिकांश रक्षा उपकरण चीन से आयात किए हैं, ने पांच भारतीय विमानों को मार गिराने का दावा किया, जिसमें 3 फ्रांसीसी राफेल जेट, सुखोई और मिग 29 भी शामिल है. इससे बाजार में सीधा फायदा चीन की कंपनियों विशेष रूप से जे-10सी लड़ाकू विमान बनाने वाली एवीआईसी चेंगदू एयरक्राफ्ट कंपनी को मिला, जिसके शेयरों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई.
इससे संकेत मिलता है कि निवेशकों को उम्मीद है कि चीन के रक्षा निर्यात, विशेषकर पाकिस्तान जैसे देशों को, उनमें वृद्धि हो सकती है. पिछले पांच वर्षों में पाकिस्तान द्वारा आयात किए गए कुल हथियारों में से 81% चीन ने आपूर्ति किए हैं, स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट (SIPRI) का ऐसा कहना है.
चीन लगातार अमेरिकी तकनीक को चुनौती दे रहा है. हाल के वर्षों में, कई चीनी कंपनियों पर अमेरिकी प्रतिबंधों और निगरानी के बावजूद, वे अमेरिकी बाजारों और आपूर्ति नेटवर्क में अपनी उपस्थिति बनाए रखने में सफल रही हैं. चीनी सैन्य कंपनियों की अमेरिकी टेक्नोलॉजी आपूर्ति श्रृंखला में गुप्त पैठ अमरीकियों के लिए पहले ही चुनौती बना हुआ है, जो अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक हितों और तकनीकी श्रेष्ठता के लिए खतरा पैदा कर रहा है.
भारत-पाकिस्तान युद्ध के चलते भारतीय बाजारों से निवेशक खिसकने का फायदा चीन को मिलता आया है. पहलगाम हमले के बाद जब भारत-पाक तनाव बढ़ा, तो चीनी रक्षा कंपनियों के शेयरों में तेजी देखी गई. चाइना नॉर्थ इंडस्ट्रीज ग्रुप (NORINCO) और अन्य कंपनियों को भी बाजार में उछाल मिला. इस बीच चीन ने पाकिस्तान को आपातकालीन रक्षा उपकरणों की आपूर्ति बढ़ा दी, जिसमें मिसाइल इंटरसेप्टर और J-10C के स्पेयर पार्ट्स शामिल थे. यह सभी घटनाएं इस दिशा में संकेत करती हैं कि चीन ने पाकिस्तान को युद्ध के लिए तैयार किया और भारत को अपनी सीमाओं के भीतर बांधने की कोशिश की. दिलचस्प बात यह है कि हाल ही में बांग्लादेश ने भी चीनी फाइटर विमान को अपनी सेना में शामिल करने में दिलचस्पी दिखाई थी.
चीन लगातार अपने रक्षा क्षेत्र को मजबूत कर रहा है और अब डीपसीक के जरिए अपनी तकनीक को भी लगातार उन्नत कर रहा है. हांगकांग स्थित साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने नए सैन्य विमानों के डिज़ाइन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) प्लेटफॉर्म डीपसीक का उपयोग शुरू कर दिया है. चीनी स्टार्टअप डीपसीक को अमेरिकी टेक कंपनियों के मुकाबले एक किफायती विकल्प के रूप में देखा जा रहा है. शेनीयांग एयरक्राफ्ट डिज़ाइन इंस्टीट्यूट के प्रमुख डिज़ाइनर वांग योंगचिंग ने कहा, “इस तकनीक ने पहले ही आशाजनक संभावनाएं दिखाई हैं और भविष्य के एयरोस्पेस अनुसंधान एवं विकास के लिए नए विचार और दृष्टिकोण प्रदान किए हैं.” यह संस्थान चीन की सरकारी कंपनी एविएशन कॉर्पोरेशन ऑफ चाइना का हिस्सा है और J-15 व J-35 जैसे एडवांस फाइटर जेट्स के विकास पर काम करता है.
चीन का सैन्य आधुनिकीकरण राष्ट्रपति शी जिनपिंग की नीति प्राथमिकताओं का एक केंद्रीय स्तंभ रहा है. पारंपरिक रूप से चीन के हथियार निर्माता लगभग पूरी तरह से पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की आवश्यकताओं की पूर्ति पर केंद्रित रहे हैं. हालांकि, पिछले एक दशक में इनमें बड़ा बदलाव देखने को मिला है. अब ये कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजारों की ओर रुख कर रही हैं ताकि घरेलू बिक्री के अतिरिक्त राजस्व अर्जित किया जा सके और बीजिंग के भू-राजनीतिक लक्ष्यों को भी समर्थन मिल सके. चीन के वैश्विक सुरक्षा और आर्थिक प्रभाव का अहम पहलू हथियार निर्यात चीन की वैश्विक सुरक्षा और आर्थिक रणनीति का एक ऐसा पहलू है, जिसे अक्सर नजरअंदाज किया जाता है, लेकिन यह न केवल चीन के प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाता है, बल्कि उन बाजारों में यूरोपीय हथियार निर्माताओं के लिए प्रतिस्पर्धा और नीति चुनौती भी प्रस्तुत करता है जहां उनके हित आपस में टकरा सकते हैं.
(फाइल : J-10C)
चीन की रक्षा उद्योग की वृद्धि (2015-2025)
2015 में चीन का रक्षा बजट लगभग 146 अरब डॉलर था. 2024 में यह बढ़कर लगभग 314 अरब डॉलर हो गया. 2025 के लिए अनुमानित बजट 320-340 अरब डॉलर के बीच है. भारतीय रुपये में 330 अरब डॉलर को देखें तो आज के हिसाब से ये रकम बैठती है 27,720 अरब रुपये. चीन का रक्षा बजट भारत से लगभग 3.6 गुना अधिक है.
चीन की रक्षा उद्योग में NORINCO, AVIC, और CSIC जैसे राज्य-स्वामित्व वाले दिग्गज शामिल हैं. आधुनिक हथियारों में J-20 स्टेल्थ फाइटर, Type 055 विध्वंसक, हाइपरसोनिक मिसाइलें चीन की सफलता है. ड्रोन, AI आधारित सिस्टम और नौसैनिक क्षमता में चीन ने वैश्विक नेतृत्व की दिशा पकड़ी (754 पोत, 3 विमानवाहक पोत). मजबूत घरेलू आपूर्ति श्रृंखला और अफ्रीकी देशों व पाकिस्तान को बड़े पैमाने पर निर्यात. अमेरिका ($997 अरब) के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रक्षा बजट चीन का ही है.
ऐसे में चीन के लिए यह युद्ध एक अवसर बन गया, न केवल अपने हथियारों की 'वास्तविक युद्ध में परख' दिखाने का, बल्कि वैश्विक ध्यान दक्षिण चीन सागर और ताइवान जैसे मुद्दों से हटाने का भी.
बलूचिस्तान | वो चिंगारी जो चीन को बेचैन कर गई : मार्च 2025 में बलूचिस्तान के ग्वादर और ओरमारा इलाकों में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) पर हमलों की एक श्रृंखला ने बीजिंग को सकते में डाल दिया. इन हमलों में चीनी इंजीनियरों को निशाना बनाया गया और पाकिस्तान के सुरक्षा बलों की कमजोरियों को उजागर किया गया. 4 मार्च 2025 को ग्वादर पोर्ट पर हुए आत्मघाती हमले में 3 चीनी इंजीनियर मारे गए. इसके बाद 7 मार्च 2025 को ओरमारा हाईवे पर सीपैक काफिले पर हमला हुआ, जिसमें 6 पाकिस्तानी सैनिक और 1 चीनी नागरिक की मौत हुई. इन घटनाओं के तुरंत बाद बीजिंग में चीनी विदेश मंत्रालय ने सुरक्षा "परामर्श बैठकें" बुलाईं, जिसमें पीएलए के प्रतिनिधियों ने भाग लिया. इन बैठकों में भारत पर 'अप्रत्यक्ष दबाव' बनाने की चर्चा हुई, ताकि वह बलूचिस्तान में हस्तक्षेप से पीछे हटे. इंटरनेशन मीडिया में पाकिस्तान की ओर से बलूचिस्तान में उपजे तनाव के लिए भारत को जिम्मेदार बताया गया.
पहलगाम हमला | एक प्रॉक्सी ट्रिगर : कश्मीर के पहलगाम में धर्म पूछकर पर्याटकों की हत्या प्रॉक्सी ट्रिगर की तरह दिखती है. भारत ने इस पर तीव्र प्रतिक्रिया देते हुए 'ऑपरेशन सिंदूर' नाम से एक उच्च तीव्रता वाली सैन्य कार्रवाई शुरू की, जो नियंत्रण रेखा पार कर पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर में लॉन्च की गई. अगर बलूचिस्तान में भारत की सक्रियता के आरोप सही हैं, तब चीन ने एक ही दांव से सीधे बलूचिस्तान में घुसे भारत को अपनी सरहद के भीतर ला दिया है. बलूचिस्तान में फिर बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी ने 12 पाकिस्तानी सैनिकों को मारा है. ये पूरा खेल दक्षिण एशिया में जरूर चल रहा है, लेकिन ताकत वैश्विक स्तर पर दिखाई जा रही है.
6 लाभ जो चीन ले उड़ सकता है
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भारत के रणनीतिक फोकस में बंटवारा : भारत-पाकिस्तान संघर्ष की स्थिति में भारत की सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक ऊर्जा पश्चिमी सीमा (पाकिस्तान) पर केंद्रित हो जाएगी. इससे लद्दाख और अरुणाचल जैसे भारत-चीन विवादित क्षेत्रों में चीन को लाभ मिल सकता है. भारत के व्यस्त रहने से चीन इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है और दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ा सकता है. मसलन साल 1962 के भारत-चीन युद्ध में, चीन ने क्यूबा मिसाइल संकट जैसे वैश्विक तनावों का लाभ उठाकर हमला किया था.
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चीन-पाकिस्तान रणनीतिक गठबंधन को मजबूती: चीन और पाकिस्तान पहले से करीबी साझेदार हैं. संघर्ष की स्थिति में पाकिस्तान की चीन पर निर्भरता बढ़ेगी, जिससे चीन को अधिक नियंत्रण और प्रभाव मिलेगा. यह भारत के अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे पश्चिमी साझेदारों के साथ बढ़ते संबंधों का संतुलन बनाता है.
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आर्थिक और व्यापारिक अवसर: संघर्ष से भारत की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा. चीन पाकिस्तान को हथियार सप्लाई करके और भारत के व्यापारिक अंतर को भरकर फायदा उठा सकता है. ग्लोबल सप्लाई चेन पहले से तनाव में हैं. भारत कमजोर पड़ा तो चीन दक्षिण एशिया में प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन सकता है. इतिहास में भी चीन ऐसा कर चुका है, जब 19वीं सदी में चीन ने अफीम व्यापार के ज़रिए भारत की स्थिति का शोषण किया था.
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भारत की वैश्विक छवि को कमजोर करना: लंबे संघर्ष से भारत की वैश्विक मंचों पर छवि बिगड़ सकती है. इससे चीन को UN, G20 और BRICS में अधिक प्रभाव मिल सकता है. भारत की 2023 में G20 अध्यक्षता और पश्चिमी देशों से नज़दीकी चीन को चुनौती देती है.
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वैश्विक व्यस्तताओं का लाभ उठाना: यदि अमेरिका और NATO रूस-यूक्रेन या मिडिल ईस्ट जैसी जगहों पर व्यस्त रहें तो चीन को ताइवान, दक्षिण चीन सागर जैसे मुद्दों पर आगे बढ़ने का अवसर मिल सकता है. 1962 में चीन ने क्यूबा मिसाइल संकट के दौरान भारत पर हमला करके यह रणनीति अपनाई थी.
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सैन्य और तकनीकी लाभ: पाकिस्तान चीन के हथियारों का इस्तेमाल करता है, जैसे ड्रोन और फाइटर जेट. युद्ध की स्थिति में ये हथियार "टेस्टिंग ग्राउंड" बन सकते हैं और चीन के रक्षा उद्योग को लाभ होगा. यदि ये हथियार कारगर सिद्ध होते हैं, तो चीन के हथियारों की अंतरराष्ट्रीय बिक्री बढ़ेगी.
बहरहाल, भारत और पाकिस्तान अब जिस युद्ध की कगार पर हैं, वह केवल सीमाओं का मामला नहीं, बल्कि यह वैश्विक भू-राजनीति की एक बड़ी बिसात का हिस्सा है, जिसमें चीन मास्टरमाइंड की भूमिका निभा रहा है और अपने रक्षा उद्याोग को नई उंचाइयों पर ले जा रहा है.
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