अंग्रेज तो बीच युद्ध से भाग खड़े हुये, इधर भारतीय सेनाओं ने भालों के दम पर मशीनगन वाली फौज से भिड़कर आजाद करवा लिया था फिलिस्तीन

फिलिस्तीनअंग्रेज तो बीच युद्ध से भाग खड़े हुये, इधर भारतीय सेनाओं ने भालों के दम पर मशीनगन वाली फौज से भिड़कर आजाद करवा लिया था फिलिस्तीन

NEWSMAN DESK

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बीते दिनों फिलिस्तीन और इजरायल के बीच चले संघर्ष को लेकर भारत में भी खूब चर्चाएं रही हैं। इस लड़ाई को लेकर भारतीयों के एक पक्ष ने जहां फिलिस्तीन के समर्थन में अपनी आवाज बुलंद की, वहीं एक तबका इजरायल के पक्ष में शोर मचाता हुआ भी नजर आया। भारत के दोनों मुल्कों से बेहतर रिश्ते रहे हैं, लेकिन भारत ने हमेशा ही फिलिस्तीन में शांति का पक्ष ही अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर लिया है और यह भारत की नीति का हिस्सा रहा है। इन मुल्कों से भारतीयों का पुराना ताल्लुक भी रहा है।

असल में फिलिस्तीन को कभी ऑटोमन सम्राज्य (तुर्की) से आजाद करवाने में भारतीय सेनाओं ने निर्णायक भूमिका निभाई थी। ये इतना भीषण युद्ध था कि इतिहास में इसे 'बैटल ऑफ हाइफा' के नाम से जाना जाता है। हाइफा शहर इस समय इजरायल में है और हर साल की 23 सितंबर को वहां पर हाइफा दिवस मनाया जाता है। इसमें भारतीय रियासतों की तीन सेन्य ब्रिगेड शामिल हुुई थी। ये जीत इतनी बड़ी थी कि अंग्रेजों ने इस युद्ध में भारतीय सेना के अदम्य साहस के सम्मान में दिल्ली में त्रिमूर्ति चौक का निर्माण करवाया। इस चौक पर तीन सैनिकों की मूर्ति भारत की तीन रियासतों की सेना का प्रधिनिधित्व करती है। 

(तीन मूर्ति हाइफा चौक नई दिल्ली और इनसेट में भारतीय सैनिकों को सलामी देता एक अंग्रेज अधिकारी)

क्या है 'बैटल ऑफ हाइफा' का इतिहास
अरब लोगों का देश फिलिस्तीन चार सौ सालों से तुर्की के उस्मानिया सल्तनत या ऑटोमन एम्पायर के अधीन था। फिलिस्तीनी लोग 18 वीं सदी से ही अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे। पहले विश्व युद्व के दौरान जर्मनी, इटली और उस्मानिया सल्तनत एक तरफ थे और दूसरी तरफ ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य देश। इंग्लैंड गुपचुप तरीके से फिलिस्तीनी लोगों को उस्मानिया के खिलाफ हथियार पहले से ही मुहैया करवाता रहा था, लेकिन प्रथम विश्व युद्ध होने पर इंग्लैंड ने फिलिस्तीन को कब्जाने के लिये यहां युद्ध छेड़ दिया। जब सफलता नहीं मिली तो उन्होंने भारत की तीन रियासतों से संपर्क साधा। ये रियासत थी हैदराबाद, मैसूर और जोधपुर। गढ़वाल राइफल पहले से ही फ्रांस को बचाने के लिये रिचनबर्ग में लड़ रही थी।

तीनों रियासतों की ब्रिगेड फिलिस्तीन के प्रमुख शहर हाइफा पहुंची। हैदराबाद की सेना को युद्धबंदियों की सुरक्षा के लिये रखा गया, जबकि मैसूर और जोधपुर की सेना को संयुक्त रूप से एक बड़ी यूनिट में तब्दील कर दिया गया, जिसे अंग्रेजों  की सेना के नेतत्व में लड़ना था। इस यूनिट को हाइफा पर कब्जा करने के लिये भेजा गया। युद्ध से पहले अंग्रेजों को खुफिया जानकारी मिली कि उस्मानिया सल्तनत की मदद के लिये जर्मनी और इटली की सेना भी हाइफा पहुंच गई हैं, जबकि आश्चर्य की बात यह थी कि इस यूनिट को घोड़े पर सवार होकर तलवार और भालों से यु़द्व करना आता था। इसके उलट उस्मानिया के सैनिक आधुनिक राइफल और तोपों से सुसज्जित थे। ऐसे में अंग्रेजों की बिग्रेड ने यु़द्व करने से इनकार कर दिया, लेकिन भारतीय सेनाओं ने युद्व न करने का फरमान मानने से इनकार कर दिया। अंग्रेज घबराहट में पीछे हट गये, लेकिन उन्होंने भारतीय सेना को यु़द्व में जाने दिया। 

23 सितंबर, 1918 की सुबह भारतीय घुड़सवार और पैदल सैनिकों ने हाइफा की ओर बढ़ना शुरू किया। वे तलवार और भालों से सुसज्जित थे। भारतीय सेना का मार्ग माउंट कार्मल पर्वत श्रृंखला के साथ लगता हुआ था और किशोन नदी एवं उसकी सहायक नदियों के साथ दलदली भूमि की एक पट्टी तक सीमित था। जैसे ही सेना 10 बजे हाइफा पहुंची, वह माउंट कार्मल पर तैनात  77 एमएम बंदूकों के निशाने पर आ गए।

भारतीय सेना का नेतृत्व कर रहे जवानों ने यहां बहुत सूझबूझ दिखाई। मैसूर लांसर्स की एक स्क्वाड्रन शेरवुड रेंजर्स के एक स्क्वाड्रन के समर्थन से दक्षिण की ओर से माउंट कार्मल पर चढ़ी। उन्होंने दुश्मनों पर अचानक हैरान कर देने वाला हमला कर कार्मल की ढलान पर दो नौसैनिक तोपों पर कब्जा कर लिया। उन्होंने दुश्मनों की मशीनगनों के खिलाफ भी वीरता के साथ आक्रमण किया। उधर, दो बजे बी बैटरी एचएसी के समर्थन से जोधपुर लांसर्स ने हाइफा पर हमला किया। मजबूत प्रतिरोध के बावजूद भी लांसर्स ने बहादुरी के साथ दुश्मनों की मशीनगनों पर सामने से आक्रमण किया। तीन बजे तक भारतीय घुड़सवारों ने उनके स्थानों पर कब्जा कर तुर्की सेना को पराजित कर हाइफा पर कब्जा कर लिया। इस युद्ध में लगभग 700 भारतीय सिपाही शाहिद हुये थे, लेकिन उनके अदम्य साहस ने मौत उगलती मशीनगनों और तोपों को भी परास्त कर दिया था।

(हाइफा में लांसर्स)

दुनिया का सबसे साहसिक युद्ध है 'बैटल ऑफ हाइफा'
हाइफा का युद्ध दुनिया के कई देशों के सैन्य काॅलेजों में पढ़ाया जाता है। 1950 तक जो सैन्य अधिकारी इंडियन मिलिट्री एकेडमी से पास आउट होते थे, उन्हें बाद में मेजर रैंक में प्रमोशन के लिये इस कोर्स को अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाता था। आज हाइफा इजरायल का शहर है। वहां भारतीय सेनाओं के अदम्य साहस पर एक स्मारक है और उसकी पाठयक्रम में भी इस युद्ध का जिक्र किया गया है। बहरहाल, बाद में फिलिस्तीन तो उस्मानिया सल्तनत से आजाद हो गया, लेकिन ब्रिटेन ने उस पर कब्जा कर लिया और बाद में इजारयल के गठन होने पर हाइफा फिलिस्तीन से फिर अलग हो गया।

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